तुम्हारी ख़ातिर

Photo by Elijah O'Donnell from Pexels
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दिन ढलने पर लेट तो जाते हैं
मग़र रात सिरहाने नहीं आती
तुम्हारी ख़ातिर आँखें मूँद रहे हैं
मग़र तुम्हारे बग़ैर
इन आँखों में नींद नहीं आती

ग़म के घूँट पी तो जाते हैं
मग़र ख़ुशी नज़दीक नहीं आती
तुम्हारी ख़ातिर जतन कर रहे हैं
मग़र तुम्हारे बग़ैर
इन होंठों पर मुस्कान नहीं आती

प्याले मय से भीग तो जाते हैं
मग़र सीने की आग बुझ नहीं पाती
तुम्हारी ख़ातिर दिल को समझा रहे हैं
मग़र तुम्हारे बग़ैर
इन धड़कनों को राहत नहीं आती

इश्क़ कितना है तुमसे
इसकी तुलना करनी नहीं आती
तुम्हारी ख़ातिर जी तो रहे हैं
मग़र तुम्हारे बग़ैर
ऐसी ज़िंदगी जी नहीं जाती

दिन ढलने पर लेट तो जाते हैं
मग़र रात सिरहाने नहीं आती
तुम्हारी ख़ातिर आँखें मूँद रहे हैं
मग़र तुम्हारे बग़ैर
इन आँखों में नींद नहीं आती

© अपूर्वा बोरा​

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