उसकी बातें

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उसकी ज़ुल्फ़ सुलझाते सुलझाते मैं ख़ुद उसमें उलझता चला जाता हूँ
वो पलट कर देखती है मेरी ओर और मैं उन अदाओं से मचलता चला जाता हूँ

उसके आँसू पोछते पोछते मैं अपनी ज़िंदगी के घूँट चुपचाप पीता चला जाता हूँ
वो पूछती है मेरे दिल का हाल और मैं धड़कनें सुनाता चला जाता हूँ

उसकी मुस्कान संवारते संवारते मैं अपना हाल भुलाता चला जाता हूँ
वो खिलखिला उठती है जब मैं उस हँसी की मधुरता में समाता चला जाता हूँ

उसके ख़याल बुनते बुनते मैं अपनी ही कहानी में भटकता चला जाता हूँ
वो ख़्वाब में आती है किसी रोज़ तो मैं नींद से प्रीत निभाता चला जाता हूँ

उसकी आँखों में देखते देखते मैं तैराक होकर भी डूबता चला जाता हूँ
वो बुलाती है मुझे क़रीब और मैं उसके आगोश में बहता चला जाता हूँ

उसके साथ रहते रहते मैं दुनिया जहां से दूरियाँ बढ़ाता चला जाता हूँ
वो फ़ेरती है मेरे सिर पर हाथ और मैं पलकों में उसे सजाता चला जाता हूँ

उसकी बातें करते करते मैं अक्सर उसकी यादों में घुलता चला जाता हूँ
वो करती है ऐतबार मुझ पर तो मैं भी उसका हाथ थामता चला जाता हूँ

उसकी ज़ुल्फ़ सुलझाते सुलझाते मैं ख़ुद उसमें उलझता चला जाता हूँ
वो करती है इज़हार और मैं भी मोहब्बत में दिल लुटाता चला जाता हूँ

© अपूर्वा बोरा​

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