वो नहीं

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ये सफ़र की राहें कैसी
पा कर तुझे भूल गया
तुझे खोने की बेबसी
आगे बढ़ता चला गया
तू रह गई पीछे कहीं
ये सफ़र की राहें भी कैसी
जहाँ मैं हूँ अब वहाँ तू नहीं

ये जिंदगी की राहें कैसी
संग तेरे सब जी गया
बिन तेरे कुछ है कमी
मुसाफ़िर जो भटक गया
मोड़ पर खड़ा है यहीं
ये जिंदगी की राहें कैसी
जहाँ मैं हूँ अब वहाँ तू नहीं

ये इश्क़ की राहें कैसी
खो कर तुझे हार गया
चैन सुकूँ और नींद भी
ऐसे ही जीना सीख गया
मग़र ऐसे जीना था नहीं
ये इश्क़ की राहें कैसी
जहाँ मैं हूँ अब वहाँ तू नहीं

इस राह में आगे बढ़ना अब मुमकिन नहीं

उसे साथ लिए निकला था,
ख़ाली हाथ घर लौटा हूँ
ये भूलना अब मुमकिन नहीं
उसे पा कर खो चुका हूँ,
ये भूलना अब मुमकिन नहीं

इस राह में आगे बढ़ना अब मुमकिन नहीं
जहाँ मैं हूँ अब वहाँ वो नहीं

© अपूर्वा बोरा​

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