वो पूछते हैं

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वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं नींद से इतना क्यों हूँ ख़फ़ा?
जब तक ख़्वाबों में तू न आये
कमबख़्त नींद का मैं करूँ भी क्या?

वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं दुनिया से इतना क्यों हूँ जुदा ?
जब तक तू मुझे हासिल न हो जाये
कम्बख़्त दुनिया से मैं करूँ भी क्या?

वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं तुझ पर इतना क्यों हूँ फिदा?
जब तक पिहरवा तू न बन पाये
कम्बख़्त तुझ से मैं करूँ भी क्या?

वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं मरासिम में इतना क्यों हूँ लुटा?
जब तक नफ़्स तुझसे न जुड़ जाये
कम्बख़्त मरासिम से मैं करूँ भी क्या?

वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं मोहब्बत में इतना क्यों हूँ फ़ना?
जब तक तुझे एहसास न दिला पाये
कम्बख़्त मोहब्बत का मैं करूँ भी क्या?

वो पूछते हैं अक्सर मुझसे कि
मैं नींद से इतना क्यों हूँ ख़फ़ा?
जब तक ख़्वाबों में तू न आये
कमबख़्त नींद का मैं करूँ भी क्या?

© अपूर्वा बोरा​

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