याद मत आना

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मैंने नींद को सुलह का पैगाम भिजवाया है
बस तुम ख़्वाबों में दस्तक न दे जाना
जाना, तुम आज भी याद मत आना

जैसे तुमने हमारे दरमियां फ़ासला बढ़ाया है
ठीक उसी तरह मेरी नज़रों से दूर हो जाना
मैंने उम्मीद को दहलीज़ से वापस लौटाया है
बस तुम इशारों का कोई खेल न खेल जाना
जाना, तुम आज भी याद मत आना

जैसे तुमने अपने जीवन से मेरा अवशेष मिटाया है
ठीक उसी तरह मेरा नाम ज़ुबां से मिटा जाना
मैंने मोहब्बत पर ताज़ा मरहम लगाया है
बस तुम पुराना ज़ख़्म हरा न कर जाना
जाना, तुम आज भी याद मत आना

जैसे तुमने अपने उन वादों को भुलाया है
ठीक उसी तरह मेरे दिल का पता भूल जाना
मैंने फ़िर किसी से दिल लगाया है
बस तुम किसी मोड़ पर न टकरा जाना
जाना, तुम आज भी याद मत आना

मैंने ख़ुद ही अपना हौसला बढ़ाया है
बस तुम कोशिश पर पानी न फेर जाना
जाना, तुम आज भी याद मत आना

© अपूर्वा बोरा​

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