ये काले घेरे

Photo by Pixabay on Pexels

ये काले घेरे शायद मेरी आँखों से गहरे हैं
अब तो रातें करवटों के बीच गुज़र जाती हैं
सुकून और मेरे बीच न जाने कितने पहरे हैं

ओढ़कर सोती थी जिसके जिस्म की चादर
उसकी सुगंध अब बिस्तर से आती नहीं
उसे भूल पाना मुमकिन होता तो भुला देती
मग़र कम्बख़्त उसकी याद दिल से जाती नहीं

जो कह कर गया था भोर फटते ही लौट आएगा
सहर संग उसके आने की ख़बर अब आती नहीं
न करती उसका इंतज़ार एक भी दिन और
मग़र कम्बख़्त उसके आने की आस जाती नहीं

डालकर चलती थी जिसके हाथों में अपना हाथ
उसकी उंगलियां अब मेरी उंगलियों में आती नहीं
बुन लेती किसी और से इस स्पर्श का ताना बाना
मग़र कम्बख़्त उसका हक यूँ बाँट पाती नहीं

जो कह कर गया था जीवन भर साथ निभायेगा
तन्हाई में शायद उसे अब मेरी याद आती नहीं
ऐतबार न करती उसके झूठे वादों पर फ़िर कभी
मग़र कम्बख़्त उसकी चाहत यूँ भुला पाती नहीं

सो जाती थी बेफ़िक्र जिसके सीने पर सिर रख कर
उसकी ग़ैरमौज़ूदगी में नींद मुझे अब आती नहीं
आँखें मूँद लेती हूँ अकेले में न जाने कितनी बार
मग़र कम्बख़्त मैं ही ये आदत बदल पाती नहीं

ये काले घेरे शायद मेरी आँखों से गहरे हैं
अब तो रातें करवटों के बीच गुज़र जाती हैं
सुकून और मेरे बीच न जाने कितने पहरे हैं

© अपूर्वा बोरा​

Leave a Reply