ये रास्ता

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शायद किसी ठंड की रोज़
चाय की चुस्कियां लेते वक़्त
तुम्हें मेरे गरम तेवर याद आ जाएं
और चाय की रंगत में
मेरे सांवली सूरत देखने लगो तुम
तो वहीं ठहर जाना जनाब
ये रास्ता कहीं और ही जाता है

एक चुस्की और लेते हुए जब
तुम्हें मेरे स्पर्श का ज़ायका आ जाए
और पतझड़ के पत्ते की तरह
मेरे ख़याल में हकीकत से
दूर जाने लगो तुम
तो वहीं ठहर जाना जनाब
ये रास्ता कहीं और ही जाता है।

जब चाय की आखिरी घूँट भी
तुम्हारे गले से नीचे उतर जाए
और सांप की तरह
मेरी याद से चंदन के वृक्ष
की तरह लिपटने लगो तुम
तो वहीं ठहर जाना जनाब
ये रास्ता कहीं और ही जाता है।

जब इक़रार के बाद भी
इज़हार न हो
और इंतज़ार के बाद भी
इज़हार न हो
तो वहीं ठहर जाना जनाब
शायद तुम्हारा रास्ता
मुझसे अलग ही जाता है।

 © अपूर्वा बोरा

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