यूँ न

Photo by Federico Vecchi on Unsplash
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यूँ न झटको अपने गेसुओं का सौंधापन
देखा है पत्तों को कभी ओस झटकते हुए?
कुछ दृश्य सीधे ह्रदय में उतर जाते हैं और
तुम्हारे गेसुओं में हम भी भीग जाते हैं

यूँ न सुलझाओ अपनी लटों की उलझन
देखा है पेड़ों को कभी जड़ें सुलझाते हुए?
कुछ दृश्य ज्यों के त्यों ही सुहाते हैं और
तुम्हारी लटों में हम भी खो जाते हैं

यूँ न बाँधो अपने केशों का यौवन
देखा है किनारे को कभी नदी बांधते हुए?
कुछ दृश्य आँखों को ऐसे ही भाते हैं और
तुम्हारे केशों में हम भी क़ैद हो जाते हैं

यूँ न बदलो अपनी ज़ुल्फ़ों का बावलापन
देखा है तूफ़ान को कभी राह बदलते हुए?
कुछ दृश्य रातों की नींद उड़ाते हैं और
तुम्हारी ज़ुल्फों में हम भी मचल जाते हैं

हमें इतना भी न सताया करो
मिन्नतें करता फ़िरता हूँ जाने कितनी
आख़िर कभी तो मान जाया करो

अब कुछ दृश्य ख़्वाबों में ही सताते हैं
ये दीवाने भी बेज़ार से नज़र आते हैं

यूँ न परखो अपने दीवाने का दीवानापन
देखा है परवाने को कभी लौ परखते हुए?
कुछ दृश्य ऊपर से लिखे जाते हैं और
हम तुम बस अपना किरदार निभाते हैं

कभी हमसे भी मिलने आया करो
अरे आज़ाद करो इन बालों को
यहां सूखा पड़ा है जाने कब से
झटक कर सावन बरसाया करो
कभी हमसे भी मिलने आया करो

© अपूर्वा बोरा​

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