ज़रूरी

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कुछ
बरस
पहले
हर
दस्तक
पर
किवाड़
खोल
लेती थी
हर
सवाल
के
जवाब
दे
देती थी
हर
इंसान
पर
भरोसा
कर
लेती थी
हर
आपबीती
को
दबा
देती थी

फ़िर
वक़्त
बदलने
लगा
और
साथ ही
लोग भी

फ़िर
मौसम 
बदलने
लगा
और
साथ ही
मिज़ाज़ भी

फ़िर
ज़माना
बदलने
लगा
और
साथ ही
हालात भी

आज
कुछ
बरसों
बाद
हर
दस्तक
पर
झरोखे से
झाँक
लेती हूँ
हर
सवाल
पर
एक और सवाल
दाग
देती हूँ
हर
इंसान
की 
नीयत
भांप
लेती हूँ
हर
आपबीती
की
कहानी
सुना
देती हूँ

क्योंकि
हर दस्तक
पर किवाड़
खोलना
ज़रूरी नहीं

हर सवाल
का जवाब
देना
ज़रूरी नहीं

हर इंसान
पर ऐतबार
करना
ज़रूरी नहीं

हर बीती बात
पर पर्दा
डालना
ज़रूरी नहीं

ज़रूरी तो
सिर्फ़ यह 
है
कि
तुम 
अपनी
कहानी
अपनी
ज़ुबानी
कह
सको

क्योंकि
और 
कुछ भी
इतना
ज़रूरी नहीं।

 © अपूर्वा बोरा

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