ज़रूरी

कुछ ग़म ज़रूरी होते हैं
खुशियों की अहमियत जताने के लिए

कुछ आँसू ज़रूरी होते हैं
दिल का बोझ मिटाने के लिए

कुछ बुरे वक्त ज़रूरी होते हैं
अपनों को पहचानने के लिए

कुछ हार ज़रूरी होती हैं
जीतने की वज़ह जानने के लिए

कुछ ठोकरें ज़रूरी होती हैं
गिरकर उठ पाने के लिए

कुछ रातें ज़रूरी होती हैं
सुबहों की रोशनी दिखाने के लिए।

. . . . .

इतने ग़म नहीं ज़माने में
जो हमारी खुशियां हमसे छीन सके

इतने आंसू नहीं
जो हम उसका बोझ उठा न सके

इतने बुरे हालात नहीं
जो हम अकेले उससे लड़ न सके

इतनी हार नहीं
जो हम उससे जीत न सके

इतनी ठोकरें नहीं
जो हम उससे उठ न सके

और इतनी लंबी रातें नहीं
जो हमसे सुबह होने की उम्मीद छीन सके।

 © अपूर्वा बोरा

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