ज़ुर्रत

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हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
जब तुम उसके तेवर में
ऊंचें स्वर से सहम जाती हो
उसकी आवाज़ उठाने की
हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
बार बार उसके मांगने पर
ये माफ़ी भी स्वीकारती हो
उसकी ये हरक़त दोहराने की
ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है

हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
जब तुम उसके उन्माद में
दिए धक्के से डर जाती हो
उसकी तुम्हें धकेलने की
हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
बार बार उसके मनाने पर
ये ग़लती चुपचाप भुलाती हो
उसकी ये हरक़त दोहराने की
ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है

हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
जब तुम उसके मन में दबे
हुए गुबार से घबराती हो
उसकी तुम्हें धमकाने की
हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
बार बार उसके समझाने पर
ये सच्चाई से कतराती हो
उसकी ये हरक़त दोहराने की
ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है

हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
जब तुम उसके हाथों के
निशान गालों पर पाती हो
उसकी तुम्हें डर दिखाने की
हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
बार बार उसके सहलाने पर
ये बात सबसे छिपाती हो
उसकी ये हरक़त दोहराने की
ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है

हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
जब तुम उसके बदन के
नीचे ज़बरदस्ती घुट जाती हो
उसकी तुम्हें तड़पाने की
हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
बार बार उसके कहने पर
ये राज़ सीने में दफ़नाती हो
उसकी ये हरक़त दोहराने की
ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है

हिम्मत ऐसे ही बढ़ती है
ख़तरा ऐसे ही बढ़ता है
जब तक तुम ख़ामोश रहती हो
तब तक कुछ नहीं बदलता है

ज़ुर्रत ऐसे ही बढ़ती है
ज़ुल्म ऐसे ही बढ़ता है
फ़िर तुम आवाज़ उठाती हो
और सब कुछ बदल जाता है

© अपूर्वा बोरा​

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